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एल्युमिनियम, ऊर्जा को दूर-दूर तक पहुँचाने वाली धातु

बालकोनगर (कोरबा वाणी)- भारत जब 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने और वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब ऊर्जा क्षेत्र आर्थिक विकास और औद्योगिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पारंपरिक बिजली उत्पादन से लेकर सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और बिजली पहुंचाने वाले नेटवर्क तक, देश का ऊर्जा क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसके साथ ही डेटा सेंटर, डिजिटल सुविधाओं, उद्योगों और व्यवसायों के विस्तार से भरोसेमंद बिजली की मांग भी बढ़ रही है।

बिजली का उत्पादन करना केवल शुरुआत है, उसे जरूरत की जगह तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। घरों, उद्योगों, रेलवे, मेट्रो, हवाई परिवहन और व्यवसायों तक बिजली पहुंचाने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है। इस व्यवस्था में एल्युमिनियम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हल्का वजन, जंग से बचाव, अच्छी विद्युत चालकता और पुनर्चक्रण की क्षमता इसे ऊर्जा से जुड़े विभिन्न कार्यों के लिए उपयोगी बनाती है। सौर पैनलों के फ्रेम, उन्हें लगाने वाली संरचनाओं, बिजली ग्रिड और पवन ऊर्जा के विभिन्न घटकों में इसका इस्तेमाल होता है।

भारत में कई रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाएं शहरों और औद्योगिक केंद्रों से दूर स्थित हैं, जहां बिजली की खपत अधिक होती है। ऐसे में उत्पादित बिजली को लंबी दूरी तक पहुंचाने के लिए मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क जरूरी हैं। बिजली उत्पादन केंद्र से वितरण केंद्रों और फिर घरों एवं कारखानों तक पहुंचने के सफर में एल्युमिनियम अहम योगदान देता है। ओवरहेड बिजली लाइनों में एल्युमिनियम आधारित कंडक्टर का व्यापक उपयोग होता है। इनकी खासियत है कि ये अच्छी विद्युत चालकता के साथ हल्के भी होते हैं।

तांबा भी बिजली का अच्छा चालक है, लेकिन एल्युमिनियम का वजन काफी कम होता है। एल्युमिनियम की विद्युत चालकता, समान आयतन के आधार पर, तांबे की लगभग 61 प्रतिशत है। हालांकि, कम वजन और अपेक्षाकृत कम लागत के कारण यह लंबी दूरी तक बिजली पहुंचाने के लिए उपयोगी विकल्प बनता है।

हल्के कंडक्टर बिजली के टावरों पर पड़ने वाले भार को कम करने, स्थापना लागत घटाने और शहरी तथा दूरदराज के क्षेत्रों में बिजली नेटवर्क के विस्तार में मदद करते हैं। इस तरह एल्युमिनियम देश के व्यापक बिजली नेटवर्क को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत का ऊर्जा तंत्र लगातार विकसित हो रहा है और इसमें एल्युमिनियम का उपयोग कई क्षेत्रों में होता है। एलएनजी सुविधाओं, समुद्री तेल एवं गैस प्लेटफॉर्म, भंडारण प्रणालियों और पाइपलाइन से जुड़े ढांचे के साथ-साथ रिन्यूएबल एनर्जी और विद्युत बुनियादी ढांचे में भी इसकी उपयोगिता है।

एल्युमिनियम की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है इसकी पुनर्चक्रण क्षमता। इसे दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है, जिससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है। यह भारत की सस्टेनेबल विकास की दिशा में जारी कोशिशों का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार, औद्योगीकरण, शहरीकरण और बढ़ते विद्युतीकरण के कारण भारत की ऊर्जा मांग वर्ष 2027 तक हर साल 6.3 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। वहीं, देश अपनी स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से हासिल कर चुका है।

भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करना और वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ना है। इन लक्ष्यों के लिए रिन्यूएबल एनर्जी, बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क, ऊर्जा भंडारण और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे नए क्षेत्रों में व्यापक विकास की जरूरत होगी।

इस दिशा में भारत की अग्रणी एल्युमिनियम उत्पादक कंपनियों में से एक भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में योगदान दे रही है। कंपनी बिलेट्स, वायर रॉड्स, इनगॉट्स और रोल्ड उत्पादों सहित विभिन्न उत्पादों के माध्यम से बिजली ट्रांसमिशन एवं वितरण नेटवर्क, विद्युत बुनियादी ढांचे, रिन्यूएबल एनर्जी प्रणालियों और अन्य ऊर्जा परियोजनाओं को सहयोग देती है।

घरेलू एल्युमिनियम वायर रॉड्स क्षेत्र में लगभग 33 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी के साथ बालको की महत्वपूर्ण उपस्थिति है। 5.75 लाख टन वार्षिक उत्पादन क्षमता वाली कंपनी अपनी क्षमता को 10 लाख टन तक बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। सूरज की रोशनी से ऊर्जा प्राप्त करने से लेकर पवन ऊर्जा का उपयोग करने और बिजली को लंबी दूरी तक पहुंचाने तक, एल्युमिनियम भारत के ऊर्जा भविष्य को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।