गांव की चौहद्दी और चारों दिशाओं की रक्षा के लिए हुआ अनोखा बिदर अनुष्ठा, बुरी बलाओं और नकारात्मक शक्तियों को गांव की सीमा से बाहर भगाने की मान्यता
कोरबा (कोरबा वाणी)- गांव की चौहद्दी, चारों दिशाओं की रक्षा और बुरी बलाओं को गांव की सीमा से बाहर खदेड़ने के लिए अनुष्ठान, ग्राम वासी जिसे कहते हैं बिदर मतलब बिदारना या भगाना…
कोरबा के दादर इलाके में सदियों पुरानी लोक परंपरा का ऐसा ही अनोखा रंग देखने को मिला, जहां हर तीन साल में होने वाले ‘बिदर’ अनुष्ठान’ के जरिए ग्रामीणों ने गांव की सुख-शांति, आरोग्य और समृद्धि की कामना की।
कंकालिन मंदिर के प्रांगण में हुए इस विशेष अनुष्ठान में गांव के बैगा ने ग्राम रक्षक देवता *’ठाकुर देव’* की विधि-विधान से पूजा की। इसके बाद पूरा गांव लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और आस्था के रंग में सराबोर नजर आया।
यह अनुष्ठान पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीणों की सामूहिक आस्था और गांव की सुरक्षा से जुड़ी हुई है।
इसी परंपरा को *’बिदर* कहा जाता है। जिसका शाब्दिक अर्थ बिदारना, भगाना या दूर हटाना है.
मान्यता है कि बिदर अनुष्ठान के जरिए गांव में आने वाली बुरी बलाओं, प्रेत बाधाओं, महामारी और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट-पतंगों को गांव की सीमा से बाहर किया जाता है।
इस अनुष्ठान में गांव की सीमा पर विशेष पूजा-पाठ की जाती है जिसके लिए दादर खुर्द स्थित कंकालिन मंदिर में गांव के बैगा ने ग्राम रक्षक देवता **ठाकुर देव** की विशेष पूजा-अर्चना की. देवी-देवताओं और प्रकृति की आराधना करते हुए ग्रामीणों ने गांव की चारों दिशाओं की रक्षा और सुख-समृद्धि की कामना की। बैगा द्वारा एक गड्ढे में कलश को अभिमंत्रित कर गढ़ाया गया और उसे मिट्टी से ढक दिया गया. ऐसी मान्यता है कि ठाकुर देव को पशु भेंट के रूप में दें तो वह प्रसन्न होते हैं और गांव को बुरी बलाओं से बचाते हैं. इसी मान्यता के आधार पर दादर में ठाकुर देव को प्रसन्न करने के लिए सफ़ेद रंग का एक बकरा भेंट किया गया जो अब से “ठाकुर देव का बकरा” के नाम से गांव में विचरण करेगा.
इस दौरान पूरा गांव एकजुट नजर आया। लोकगीत गूंजे… पारंपरिक नृत्य हुआ… और सदियों पुरानी लोक संस्कृति एक बार फिर जीवंत हो उठी।
इस दौरान कुछ ग्रामीणों ने बलि प्रथा के तहत ठाकुर देव को बकरा भेंट किया. जिसे कंकालिन मंदिर से बाहर बने बलि स्थल पर बलि दी गई.
ग्रामीणों कि माने तो यह पूर्वजों से चली आ रही परंपरा है जिसे भादो मास के कृष्ण पक्ष में गणेश चतुर्थी के पहले मनाया जाता है, जिसकी मान्यता है कि बिदर के आयोजन से गांव पर मंडरा रहा अमंगल दूर होता है। बीमारी और महामारी जैसी विपत्तियों से गांव की रक्षा होती है, फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट-पतंगे दूर चले जाते हैं और गांव में सुख-शांति बनी रहती है।
सबसे खास बात ये है कि यह अनुष्ठान हर साल नहीं, बल्कि *तीन साल में एक बार* किया जाता है।
यानी तीन वर्षों के इंतजार के बाद जब बिदर का आयोजन होता है, तो पूरा गांव इसमें सहभागी बनता है। सभी एक निश्चित राशि चंदे के रूप में देते हैं जो अनुष्ठान में काम आता है.
यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गांव के लोगों को एक सूत्र में बांधने वाली परंपरा भी है। बिदर की ये परंपरा छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कई आदिवासी अंचलों में आज भी लोक आस्था का हिस्सा है। बैगा, गोंड और कोरकू जैसे आदिवासी समुदायों में प्रचलित ऐसी परंपराएं बताती हैं कि आधुनिक दौर के बीच भी लोक संस्कृति, प्रकृति और आस्था से जुड़ी अपनी सदियों पुरानी विरासत को आज भी पूरी शिद्दत के साथ सहेजे हुए हैं।

